मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

‘स्वरागिनी’ की झगड़ालू औरतें !


‘कलर्स’ चैनल पर एक नये सीरियल ‘स्वरागिनी’ के विज्ञापन ने हमारा ध्यान खींचा है। विज्ञापन में दो पड़ौसी महिलाओं की नोक-झोक का दृश्य है। एक बोरिया और बंधेज की साड़ी पहनी राजस्थानी महिला हाथ में सरौता उठाये हुए है और दूसरी बंगाली तांत की साड़ी पहनी महिला रसोई की खुरपी लिये है।
राजस्थानी महिला चिल्लाती है - ‘ऐऽ बंगालन ! सुबह-सुबह मास-मच्छी !
बंगाली स्त्री के हाथ में एक मछली आ जाती है। उसे लहराते हुए उतनी ही ऊंची आवाज में पलट कर जवाब देती है - ‘ऐऽ मारवाड़न! अगर मच्छी खाई होती तो वर्षों पहले ही बुद्धि खुल जाती।’
‘ऐऽ, पुरानी बात मत कर वरना यहीं पर सारी इज्जत उतर जायेगी।’ मारवाड़ी स्त्री जवाब देती है।
अचानक ही दिमाग में कोलकाता में बंगाली और मारवाड़ी समुदाय के लगभग 200 सालों के सह-अस्तित्व की बात कौंध जाती है। 1813 के चार्टर्ड एक्ट ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रतिद्वंद्वी दूसरी अंग्रेज कंपनियों के आने का रास्ता साफ किया, तो कोलकाता में बंगाली जमींदार बाबुओं के प्रतिद्वंद्वी राजपुताना के महाजनी साहूकारों की भी बाढ़ ला दी। भारत में व्यापार के इस स्वर्ण युग में अंग्रेज कंपनियों के मालों को बेचने और उनके लिये कच्चा माल जुटाने में ये दोनों तबके समान रूप से लगे हुए थे। 1860 में दिल्ली-कोलकाता रेलमार्ग से तो बड़ाबाजार की गद्दियों के इर्द-गिर्द एक मिनि राजस्थान ही आ बसा।
दो समुदायों का इतना लंबा सह-अस्तित्व, लेकिन आज भी देखने पर लगता है जैसे शहर के अंदर दो अलग-अलग स्वायत्त द्वीप। खान-पान से लेकर आचार-आचरण तक - सब मामलों में काफी भिन्न।
ऐसा क्यों हुआ? गांधीजी ने आजाद भारत में बंगाल के पहले मुख्यमंत्री प्रफुल्लचंद्र घोष को पत्र लिख कर कहा था कि देखना, तुम्हारे काबिना में एक मारवाड़ी मंत्री जरूर हो। उनका यह पत्र आज भी कोलकाता म्यूजियम में सुरक्षित है। 1947 से 1967 तक, जब तक राज्य में कांग्रेस की सरकारें रही, यह परंपरा कायम रही। ईश्वर दास जालान बंगाल विधान सभा के अध्यक्ष हुए, तो एक समय विजय सिंह नाहर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहे। लेकिन फिर भी, इन दो समाजों के बीच आज भी जैसी सांस्कृतिक दूरी दिखाई देती है, वह आश्चर्यजनक है।
ऐसे में, ‘स्वरागिनी’ जैसा यह सीरियल, जिसमें इन दो समुदायों के बीच पड़ौसियों वाली स्वाभाविक नोक-झोंक की झलक मिलती है, हमारे मन में गहरी उत्सुकता पैदा कर रही है। प्रश्न उठ रहा है कि क्या इधर के दिनों में, वैश्वीकरण की सबको एकमेक कर देने की आंधी से, समाज की तहों में अलगाव की दीवारें तेजी से दरकने लगी है?
इसी जिज्ञासावश ‘स्वरागिनी’ का यह विज्ञापन आकर्षक लग रहा हैं। आगे सीरियल में क्या होगा, हम नहीं जानते। निश्चित तौर पर इस सीरियल की कहानी से हमारे प्रश्न का शायद ही कोई जवाब मिल सके क्योंकि अंत में तो इसे दूसरे सभी सीरियलों की तरह ही सस्ते बाजारूपन की भेंट ही चढ़ना है। फिर भी, इन दो समुदायों में पड़ौसियों वाली अन्तरक्रिया का यह मामूली संकेत ही काफी अर्थपूर्ण नजर आता है।

भूमि अधिग्रहण कानून अध्यादेश को बदलने के संकेत

सरकारी सूत्र भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के अध्यादेश को बदलने के संकेत देने लगे हैं।
पिछले साल के अंतिम दिन जैसी हड़बड़ी में इसे जारी किया गया था तब ऐसा लगा था मानो मोदी जी ने भारत के ‘विकास’ की ऐसी कुंजी पा ली है जिसे पकड़ कर तत्काल कार्रवाई न की गयी तो वह फिर हाथ नहीं आने वाली। दरअसल, तब ओबामा जी आने वाले थे।
ओबामा जी घूम गये, बता गये कि भूमि अधिग्रहण नहीं, विकास की कुंजी है संविधान की धारा 25 की अक्षुण्णता! फिर दिल्ली का परिणाम आगया। जाहिर हुआ कि यदि भूमि अधिग्रहण संबंधी इस अध्यादेश से चिपके रहा गया तो जो दिल्ली में जो हुआ उसे सारे देश में दोहराये जाने से कोई रोक नहीं पायेगा।
इसी बीच किसानों के जत्थे कूच कर पड़े हैं संसद की ईंट से ईंट बजाने। देश के सभी किसान संगठनों ने प्रतिरोध की साझा रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है। अन्ना हजारे हुंकारे भरने लगे हैं।
हां, वामपंथी अभी अपने सांगठनिक यज्ञ में लगे हुए हैं - भारतीय कर्मवाद पर पक्की आस्था के साथ कि यदि सारे विधि-विधानों के साथ यज्ञ के कर्मकांड त्रुटिविहीन संपन्न हो जाए तो सफल यज्ञ से फल की प्राप्ति निश्चित और अटल है। यज्ञ की रहस्यमय शक्ति के चमत्कारों से ही तो मनुष्यों को देवत्व प्राप्त होता है !
बहरहाल, भारतीय राजनीति की अनंत संभावनाएं साफ नजर आ रही है। मोदी-शाह अभी से पिटे-पिटे तथा स्वच्छ भारत, जन धन, काला धन की मोदी जी की बातें और भी धिसी-पिटी दिखाई देने लगी है।

तत्वत: कमजोर ; कोरा प्रचारमूलक


ग्रीस में सिर्जिया की एलेक्सिस सिप्रस की सरकार ने यूरोपियन यूनियन से अपने कर्ज के भुगतान के लिये और ज्यादा मोहलत की मांग की है। यूरोपियन यूनियन की ओर से जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल इसके लिये तैयार नहीं है। मर्केल के हठपूर्ण रवैये से नाराज ग्रीस के प्रधानमंत्री ने पलट कर जर्मनी से द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर द्वारा ग्रीस को पहुंचाये गये भारी नुकसान की भरपाई का दावा ठोका दिया है। उन्होंने इस बाबत जर्मनी से इतनी बड़ी राशि की मांग की है, जो यूरोपियन यूनियन के ग्रीस पर कर्ज से कहीं अधिक है। और इसप्रकार, अभी ग्रीस और जर्मनी के बीच एक तीखा वाक् युद्ध जारी है।
कर्ज देना, उसके भुगतान के लिये मोहलत बढ़ाना और कर्ज की शर्तों में कभी-कभी थोड़ा रद्दो-बदल कर देना, और कभी-कभी इसे लेकर गहरा तनाव और झगड़ा तक हो जाना अर्थजगत की साधारण बाते हैं। इसका पूंजी के नैसर्गिक चरित्र से किसी ने कभी कोई सीधा संबंध नहीं देखा है। पूंजी की नैसर्गिकता उसके मुनाफे से जुड़ी होती है। जब तक पूंजी मुनाफा लाती है, तभी तक पूंजी है, अन्यथा अस्थि।
लेकिन आज (24 फरवरी 2015) के ‘टेलिग्राफ’ में प्रभात पटनायक ने ग्रीस और जर्मनी से जुड़े इसी घटनाक्रम के संदर्भ में पूंजी के नैसर्गिक चरित्र के बारे में जिस एक नयी खोज का दावा किया है, वह सचमुच चौकाने वाला है। उनका कहना है कि जरूरतमंदों की सहायता के लिये आगे न आने के पूंजी के हठी निष्ठुर चरित्र की ओर मार्क्स ने भी यथेष्ट ध्यान नहीं दिया था। इसीलिये, पूंजी के चरित्र की इस अब तक की अनखोजी ‘विशेषता’ की ओर ध्यान खींचने के लिये ही प्रभात ने अपनी इस टिप्पणी का शीर्षक दिया है - Das Capital।
आज की दुनिया के अर्थशास्त्रीय चिंतन में मार्क्स की पुनर्वापसी के साथ ही प्रबल रूप से एक रूझान यह भी दिखाई देता है कि अर्थशास्त्र के उन बिन्दुओं की तलाश की जाए जिनपर किन्हीं कारणों से भी क्यों न हो, मार्क्स ने पर्याप्त रूप से विवेचन नहीं किया या जो मार्क्स की नजरों से ओझल रह गये, और जिनकी वजह से ‘पूंजीवाद चल नहीं सकता’ की मार्क्स की भविष्यवाणी के बावजूद मार्क्स को झुठलाते हुए पूंजीवाद बदस्तूर कायम है। इसमें एक बड़ा योगदान किया है फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने। उन्होंने अपनी बहुचर्चित किताब - ‘21वीं सदी में पूंजी’ में बताया है कि चूंकि मार्क्स के समय में व्यक्तियों की आय संबंधी सरकारी तथ्य उपलब्ध नहीं थे, इसीलिये वे सामाजिक गैर-बराबरी के ग्राफ का कोई ठोस और यथार्थ चित्र नहीं देख पाये थे। उन्हें पूंजी के चरित्र के अनुसार गैर-बराबरी में लगातार वृद्धि का ग्राफ ही दिखाई दे रहा था, जबकि तथ्य बताते हैं कि अन्य राजनीतिक-सामाजिक कारणों से वास्तविक जीवन में इसमें उतार-चढ़ाव भी आया करते हैं। और यही उतार-चढ़ाव एक बुनियादी कारण है जो पूंजीवाद को आज तक किसी न किसी रूप में टिकाये हुए है, इसका खोल फट नहीं पाया है।
आर्थिक चिंतन के एक ऐसे दौर में, अक्सर केन्स के पूंजीवाद के संकट-मोचक विचारों की पैरोकारी करने वाले हमारे प्रभात पटनायक ने भी इस छोटी सी टिप्पणी के जरिये ग्रीस के वर्तमान घटनाचक्र के संदर्भ में मार्क्स की एक कमी को खोज लेने का दावा पेश किया है। वे कहते हैं - मार्क्स ने पूंजीवाद के अराजक, और शोषणकारी चरित्र को तो देखा था लेकिन इसप्रकार के हठी चरित्र को नहीं देखा। उनके शब्दों में ‘‘इसप्रकार पूंजीवाद न सिर्फ एक अराजक या शोषणकारी व्यवस्था है; यह एक हठी निर्दयी व्यवस्था है। केन्स ने उसके चरित्र की पहली बात को पहचाना था, मार्क्स ने पहली और दूसरी को देखा। लेकिन मार्क्स ने भी तीसरी पर कोई चर्चा नहीं की।’’ (Capitalism, thus, is not just an anarchic, or exploitative system; it is also a bloodyminded one, in this sense. Keynes recognised the first of these traits, and Marx recognised the first two traits. But even Marx did not discuss this third trait)
इस टिप्पणी का अंत प्रभात ने पूंजीवाद के इस निष्ठुर हठी चरित्र के भारतीय उदाहरण, मनरेगा पर पड़ रहे सरकारी कोप से किया है।
क्या कहेंगे इस तात्विक चिंतन को ! अनुमान लगाया जा रहा है कि ग्रीस और यूरोपियन यूनियन की तनातनी का कोई न कोई समाधान जल्द ही निकल जायेगा। मनरेगा भी किसी समाजवादी व्यवस्था की उपज तो नहीं है। और, इसे जारी रखा जाए या बंद कर दिया जाए, क्या इसीसे पूंजीवाद के चरित्र के बारे में कोई निर्णायक तात्विक निर्णय संभव है?
समाजवादी व्यवस्थाओं में आई तमाम विकृतियों को दिखा कर ही क्या समाजवाद के बारे में कोई तात्विक निर्णय लिया जा सकता है?
इसीलिये प्रभात की यह खोजी टिप्पणी हमें तात्विक दृष्टि से कमजोर और कोरी प्रचारमूलक लगती है। इससे पूंजीवाद के बारे में किसी की भी समझ में रत्ती भर का भी इजाफा नहीं होता। उल्टे कुछ नयी भ्रांतियों की गुंजाइश और बन जाती है। अन्यथा सच्चाई तो यह है कि लाभ पाने के लिये पूंजी की निष्ठुरता के जो चित्र मार्क्स ने दिये है, वे अन्यत्र शायद ही कहीं मिलेंगे।
http://www.telegraphindia.com/115…/…/opinion/story_5064.jsp…

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

भारत, आरएसएस और ओबामा

अरुण माहेश्वरी


राष्ट्रपति ओबामा ने भारत में अपने अंतिम भाषण में भारत के नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करने वाली संविधान की उस धारा 25 की याद दिलाई जिस धारा को बदलना आज आरएसएस के प्रमुख घोषित उद्देश्यों में एक हैं। सऊदी अरब से अपने देश लौट कर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रार्थना सभा में उन्होंने फिर से कहा कि भारत एक खूबसूरत देश है लेकिन पिछले कुछ सालों से वहां तमाम लोगों के धार्मिक विश्वासों के प्रति जो असहिष्णुता बढ़ी है, अगर महात्मा गांधी होते तो इससे उन्हें गहरा सदमा लगता।  

एक विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की, वह भी अमेरिका जैसे महाशक्तिशाली देश के राष्ट्राध्यक्ष की ऐसी बेबाक टिप्पणी से एकबारगी किसी को भी लग सकता है कि यह मर्यादा का उल्लंघन और भारत के अंदुरूनी मामले में अवांछित हस्तक्षेप है। लेकिन शील-अश्लील की थोथी बातों से परे जाकर जरूरत इस बात को समझने की है कि आखिर ओबामा क्यों इतने उतावलेपन के साथ ऐसी बातों को दोहरा रहे हैं? 

मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी इतना तो जानता है कि वे कोई हवाई बातें नहीं कर रहे हैं। भारत में वे जिस धार्मिक असहिष्णुता में वृद्धि की ओर इशारा कर रहे हैं, वह कोई अमूर्त प्रकार की चीज नहीं है। उनका साफ संकेत उस धार्मिक असहिष्णुता की ओर है, जिसे फैलाने के काम में भारत में आरएसएस अपने जन्मकाल से ही लगा हुआ है। ओबामा और अमेरिकी प्रशासन में इसके बारे में रत्ती भर भी संदेह नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विकास तथा दूसरे प्रकार की तमाम आडंबरपूर्ण बातें जितनी भी क्यों न करें, अंततोगत्वा वे इसी संघ परिवार के एक अभिन्न अंग है; भारतीय न्यायालय कुछ भी क्यों न कहे, 2002 के गुजरात जन-संहार में उनकी (नरेंद्र मोदी की) रजामंदी थी।

अमेरिका दुनिया के उन पहले देशों में एक है जिसने ‘50 के जमाने में ही आरएसएस के संगठन और उसकी विचारधारा के बारे में सुव्यवस्थित ढंग से अध्ययन करना शुरू कर दिया था। सीआईए द्वारा पोषित अमेरिकी संस्था ‘इंस्टीट्यूट ऑफ पैशिफिक रिलेशन्स’ के तत्वावधान में जे.ए.कुर्रान जूनियर द्वारा किया गया शोध, ‘मिलिटेंट हिन्दुइज्म इन इंडियन पॉलिटिक्स : ए स्टडी ऑफ द आर. एस. एस.’ को आरएसएस के बारे में किया गया शायद अपने प्रकार का पहला विस्तृत अध्ययन कहा जा सकता है। सन् 1951 में ही कुर्रान के इस शोध का प्रकाशन हो गया था और तब से लेकर अब तक अमेरिकी सत्ता संस्थान इसी के आधार पर आरएसएस की प्रत्येक गतिविधियों का अद्यतन लेखा-जोखा अपने पास रखता आ रहा हैं।

वर्तमान संदर्भ में थोड़ा अप्रासंगिक होने पर भी यहां यह बताना उचित होगा कि ‘50 का वह समय दुनिया में शीत युद्ध का समय था। उस समय किये गये इस शोध में भारत को ’स्तालिन एंड कंपनी’ के हाथ से बचाने के एक कट्टर कम्युनिस्ट-विरोधी औजार के तौरपर भी आरएसएस को चिन्हित किया गया था। इसके बावजूद, इसमें एक सांस्कृतिक संगठन के आरएसएस के नकाब को तार-तार करते हुए उसके सांप्रदायिक राजनीतिक उद्देश्यों और उसके संगठन के गोपनीय, षड़यंत्रकारी चरित्र को बहुत ही वस्तुनिष्ठ ढंग से पेश किया गया था। इसके साथ ही, इस शोध के अंत में इस निष्कर्ष पर भी पहुंचा गया था कि ‘‘ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं जिसमें फिलहाल छोटी सी शक्ति का यह संगठन भारत के सर्वोच्च आसन को पा लें।’’

कुर्रान के उस शोध के प्राक्कथन की पहली पंक्ति ही थी: ’’यह एक उग्रवादी हिन्दू संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अध्ययन है जो भारतीय गणतन्त्र में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए प्रयत्नशील हैं।’’ उन्होंने आगे लिखा : ‘‘चूँकि (केंद्रीय) सरकार धर्मनिरपेक्ष नीति से प्रतिबद्ध है, इसीलिए आर एस एस के आदर्शों की खुली घोषणा से उसकी गतिविधियों पर पाबन्दी लग सकती है। आर एस एस उस वक्त तक सरकार से वैर मोल लेना नहीं चाहता जब तक वह इस बात से आश्वस्त न हो जाए कि उसमें सरकार से निपट लेने की यथेष्ट शक्ति आ गई है।’’

कुर्रान के उस शोध का तीसरा अध्याय था - आर एस एस का कार्यक्रम। इसमें आरएस एस के संविधान की धारा 3 और 4 के उद्धरण के जरिए उसके घोषित लक्ष्यों का उल्लेख करने के बाद ही कुर्रान ने साफ शब्दों में लिखा था कि ’’ इस संविधान से संघ को हिंदू समाज के जिस प्रकार के सुदृढ़ीकरण और पुनर्जीवीकरण को समर्पित बताया गया है, उसकी कोई साफ तस्वीर सामने नहीं आती। इसमें एक हिन्दू राष्ट्र की उग्र तथा असहिष्णु पैरवी का कोई संकेत नहीं है। दरअसल, संघ के संविधान में औपचारिक तौर पर घोषित उद्देश्यों तथा संघ की वास्तविक योजनाओं में बुनियादी तौर पर फर्कहै। संघ साधन और साध्य की गोपनीयता की भत्‍​र्सना करता है, फिर भी उसके संविधान में उल्लेखित सहिष्णु हिन्दू दर्शन तथा उसके सदस्यों में कूट-कूटकर भरे गए उन्मादपूर्ण हिन्दू-परस्त और अहिन्दू-विरोधी लक्ष्यों के बीच कोई संगति नहीं है। संविधान तथा उनका घोषित दर्शन संघ के वास्तविक उद्देश्यों का धुंधला और छल भरा प्रतिबिम्ब ही है।’’ आर एस एस का राजनीति से कोई सम्बन्ध न होने की बात को भी इसमें सरासर झूठ और हास्यास्पद कहा गया है। वह अपने को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है, लेकिन संस्कृति से उसका तात्पर्य कभी भी वह नहीं रहा है जो आम तौर पर समझा जाता है। संस्कृति उसके लिये सिवाय राजनीतिक वर्चस्व कायम करने के और कुछ नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह है कि आरएसएस अपने आप में एक बहुत ही गुप्त ढंग से काम करने वाला राजनीतिक संगठन होने के बावजूद सारी दुनिया इस संगठन के विचारधारात्मक स्रोत, इसके काम करने के षड़यंत्रकारी तौर-तरीकों से भलीभांति परिचित है। अमेरिकी प्रशासन तो खास तौर पर काफी लंबे अर्से से उसपर गहराई से नजरें टिकाये हुए है। यही वह प्रमुख कारण था कि अमेरिकी प्रशासन ने नरेन्द्र मोदी को उस समय तक अमेरिका का वीसा नहीं दिया था जब तक वे चुनाव में जीत नहीं गये। और यही वजह है कि सरकार बना लेने के बाद भी, सिर्फ विकास-विकास का रागअलापने भर से आरएसएस स्वत:स्फूर्त ढंग से दुनिया की नजरों के संदेह के घेरे से बाहर नहीं आ गया है। ऊपर से, संघ परिवारियों के ‘घर-वापसी’, अल्पसंख्यकों के उपासना-स्थलों पर हमलों और दूसरी सभी बेहुदी उग्र बातों से यह संदेह का घेरा और भी ज्यादा विस्तृत और गहरा ही हुआ है।

इसके अलावा, समझने की बात है कि ‘50 से लेकर ‘90 तक की दुनिया कीपरिस्थिति और आज की दुनिया की परिस्थिति में जमीन-आसमान का फर्क आ चुकाहै। ‘90 में समाजवाद के पराभव के साथ ही शीतयुद्ध का वह काल समाप्त होचुका है, जब सोवियत प्रभाव को रोकने के लिये अमेरिका ने जिन ताकतों का खुल कर प्रयोगकिया उनमें बड़ी मात्रा में धार्मिक तत्ववादी और जेहादी ताकतें शामिल थी। इस मायनेमें भारत में भी आरएसएस को निश्चित तौर पर अमेरिकी समर्थन मिलता रहा था। ‘90 के राम जन्मभूमि आंदोलन के समय सारी दुनिया में विश्व हिन्दू परिषद की शाखाओं केफैलाव में अमेरिकी प्रशासन की कितनी भूमिका रही, इसपर  शोध करने की जरूरतहै। फिर भी, इतना तो सर्वविदित है कि राम मंदिर आंदोलन में अमेरिका से भारी मात्रामें रुपया आया करता था।

लेकिन, ‘90 के बाद का अमेरिकी अनुभव इस बात का गवाह है कि जिन धार्मिक तत्ववादी ताकतों को उसने कम्युनिस्टों को रोकने के लिये पैदा किया था, वे ही परवर्ती दिनों में भस्मासुर की तरह अमेरिका के लिये ही खतरा बन गयी। इस नयी सदी के प्रारंभ में ही, उन ताकतों ने 9 सितंबर 2001 के दिन वल्‍​र्ड ट्रेड सेंटर को ढहा कर अमेरिका को ही अपने हमले का निशाना बना लिया। सारी दुनिया के राजनीतिक टिप्पणीकारों ने तब एक स्वर में कहा था कि 9/11 के बाद, अब दुनिया वह नहीं रही, जैसी अब तक थी। ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ की तरह की नयी विचारधारात्मक दलीलें सामने आने लगी और धार्मिक उग्रवाद अमेरिका के एक प्रमुख शत्रु के रूप में माना जाने लगा। अफगानिस्तान, इराक, पूरा मध्य एशिया और पाकिस्तान का भी उत्तर-पश्चिमी सीमांत इलाका तब से लगातार धधक रहा है।

आज नरेन्द्र मोदी, भारत और ओबामा के संदर्भ में इन चर्चाओं का तात्पर्य सिर्फ यही है कि जो धार्मिक तत्ववाद किसी समय अमेरिकी विदेशनीति का एक प्रमुख औजार हुआ करता था, वही आज उसका शत्रु माना जाता है। और, नरेन्द्र मोदी की विडंबना यही है कि वे जिस आरएसएस का प्रतिनिधित्व करते हैं, अमेरिकी दृष्टिकोण में आज के समय में वह कमोबेस वैसे ही तत्वों की श्रेणी में पड़ता है जिन्हें अमेरिका अपना प्रमुख शत्रु मान रहा है। यही कारण है कि ओबामा प्रधानमंत्री श्रीमान मोदी के सारे आडंबरों से परे, उनके राजनीतिक उत्स, भारत की मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों को लेकर कहीं ज्यादा सशंकित है। भारत की अंदुरूनी राजनीति के और भी दूसरे तमाम पहलुओं पर उनकी गहरी निगाहें लगी हुई हैं।

जहां तक भारत को एक विशाल बाजार के रूप में पाने का सवाल है, अमेरिका जानता है कि इस मामले में मनमोहन सिंह भी उसके कम सहयोगी नहीं थे। भारत में आर्थिक उदारतावाद के अग्रदूत वे ही थे। और आज भी कांग्रेस दल अपनी उन नीतियों से जरा भी पीछे नहीं हटा है। इसके विपरीत, भारत जैसे एक परमाणविक शक्ति के विशाल देश में आरएसएस की तरह की उग्र धार्मिक तत्ववादी ताकत के उभार के दूरगामी घातक परिणामों से वह और भी शंकित हो उठता है। भारत में मोदी जिस प्रकार सारी सत्ता को अपने हाथों में केंद्रीभूत करके पड़ौसी देशों, पाकिस्तान, नेपाल आदि पर धौंस जमाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे भी एक जंगखोर विस्तारवादी शक्ति के उभार की अतिरिक्त आशंका पैदा होती है जो सिर्फ इस पूरे क्षेत्र में अकल्पनीय विध्वंस और अस्थिरता का कारण ही नहीं बन सकता है, बल्कि सारी दुनिया को अस्त-व्यस्त कर सकता है।

यह सच है कि अमेरिका भारत को अपनी सामरिक विश्व रणनीति का हिस्सा बनाना चाहता है, लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि वह यह काम पाकिस्तान की कीमत पर नहीं करना चाहता। उसका यही रुख इस बात का संकेत हैं कि एक विशाल उग्र तत्ववादी उन्मादित शक्ति के भरोसे वह इस क्षेत्र में अपनी कोई रणनीति तैयार करना नहीं चाहता। आरएसएस की विचारधारा से परिचित होने के नाते कोई भी इसमें एक और हिटलर के जन्म की संभावनाओं को देख सकता है, जिसने सारी मानवता के भविष्य पर प्रश्न लगा दिया था।

इन्हीं तमाम कारणों से, ओबामा द्वारा भारत के संदर्भ में बार-बार धार्मिक असहिष्णुता का उल्लेख और महात्मा गांधी का स्मरण अकारण नहीं है।         

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

‘आप’ की प्रत्याशित जीत पर सोचते हुए


सन्‘77 के बाद हम सब भारतीय जनतंत्र के एक और ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनेंगे। कांग्रेस इस जनतंत्र की सभी अच्छाइयों और साथ ही इसमें आई विकृतियों का भी गोमुख है, सिवाय सांप्रदायिकता के। भाजपा सांप्रदायिकता और कांग्रेस शासन की तमाम विकृतियों की प्रतिनिधि है। इसमें स्वस्थ कहा जाए, ऐसा कुछ नहीं दिखाई देता। वह हमारे जनतंत्र में आई सारी विकृतियों का एक चरम रूप है। इसकी तुलना में ‘आप’ भारतीय जनतंत्र के तमाम विकासशील स्वस्थ पक्षों और संभावनाओं को अपने में समेटे हुए हैं।
हम जानते हैं, शीघ्र ही ‘प्रभात पटनायक’ ‘आप’ के वर्ग चरित्र का एक आख्यान लेकर, ‘नव-उदारवाद’ के प्रति उसके रूझान के 'यक्ष प्रश्न' के साथ हाजिर होने वाले हैं - ‘नव-उदारवाद’ को पूंजीवाद से अलग एक इतिहासशून्य विविक्ति (abstraction) के रूप में पेश करते हुए। मानो मजदूर वर्ग की घोषित पार्टियां संसदीय राजनीति का इस्तेमाल सचमुच पूंजीवाद के अंत की किसी फैसलाकुन लड़ाई के लिये कर रही हो!
वास्तविक इतिहास से काट कर देखने पर न वर्गीय चरित्र का, न नव-उदारवाद का और न वर्ग-संघर्ष जैसी विविक्तियों का कोई मूल्य होता है। खुद कम्युनिस्ट पार्टी भी इतिहास में अपनी ठोस भूमिका से कोई अर्थवत्ता ग्रहण करती है, सिर्फ अपने साइनबोर्ड से नहीं।
‘77 के समय एकदलीय और एक व्यक्ति की तानाशाही का मुकाबला मजदूर वर्ग के घोषित दावेदारों के नेतृत्व में नहीं किया गया था। लाभ उन्हें जरूर मिला। उसीप्रकार, जनतंत्र में आई विकृतियों के एक चरम रूप और उसपर सांप्रदायिक उन्माद के खिलाफ लड़ाई के इस नये मोड पर भी भारतीय वामपंथ नेतृत्व देने में असमर्थ है। फिर भी वह लाभान्वित जरूर होगा, अपने प्रभाव के क्षेत्रों में। हम देखना चाहते हैं उसकी पहलकदमी को, ‘आप’ की तरह के नये स्वस्थ जनतांत्रिक उभार के साथ उसके जैविक संबंधों को।

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

दिल्ली से आ रहे संकेत


अरुण माहेश्वरी

क्या दिल्ली चुनाव नरेंद्र मोदी का वाटरलू साबित होने जा रहा है ? केंद्र सरकार को आईबी की रिपोर्ट भी कुछ ऐसा ही संकेत देती है। इस बात के कुछ ठोस कारण और लक्षण भी दिखाई देने लगे हैं ।

पहला, भाजपा के लिये दिल्ली के ग्रामीण इलाक़ों में कोई भविष्य नहीं बचा है । केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण के बारे में जो अध्यादेश जारी किया है, वह शहरी क्षेत्रों के निकट की ग्रामीण जनता के खिलाफ सीधे तौर पर युद्ध की घोषणा से कम नहीं है ।

दूसरा, दिल्ली के बस्ती इलाक़ों में भाजपा की स्थिति पहले से ही कमज़ोर रही है और अभी तक उसमें कोई सुधार नहीं आया है । कॉलोनियों को रेगुलराईज करने की दिशा में सिर्फ एक घोषणा भर की गयी है, जिसकी कोई क़ानूनी वैधता नहीं है । इस मामले में भाजपा के इरादे आज भी हमेशा की तरह संदेह के घेरे में हैं ।

तीसरा,  दिल्ली के अल्प-संख्यकों में अब कोई दुविधा नहीं है । भाजपा और संघ परिवार के नेताओं की धर्म-परिवर्तन और नफ़रत फैलाने की हरकतों तथा गिरजाघरों में आगज़नी की घटनाओं ने अल्पसंख्यकों के सभी समुदायों को भाजपा के खिलाफ दूसरे किसी भी समय की तुलना में कहीं ज्यादा एकजुट कर दिया है । संघ परिवार के लोगों की दंगा भड़काने की साज़िशों का आम आदमी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने जिस बहादुरी से मुक़ाबला किया, उसने इन समुदायों को और भी जागृत किया है ।


चौथा, पेट्रोलियम पदार्थों की अन्तरराष्ट्रीय दरों में भारी गिरावट के बावजूद रोजमर्रे की ज़रूरी चीज़ों के दामों को कम करने में भाजपा सरकार की पूर्ण विफलता ने मध्यवर्ग के तबक़ों का भाजपा के प्रति मोहभंग किया है ।


पांचवा, भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा पर पहले भी किसी को कोई भरोसा नहीं था । अब भाजपा के परंपरागत नेताओं को हटा कर किरण बेदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फ़ैसला करके खुद भाजपा के सर्वोच्च नेतृत्व ने भी खुले आम दिल्ली की भाजपा के प्रति अविश्वास जाहिर कर दिया है ।


छठा, किरण बेदी एक अक्षम पुलिस अधिकारी रही हैं । उन्हें पुलिस सेवा में भी अराजक व्यवहार और निकम्मेपन की वजह से किसी भी उच्च पदस्थ अधिकारी को स्वाभाविक तौर पर मिलने वाले पदक भी नहीं मिल पाए । इसके अलावा, आम आदमी पार्टी के पूरे आंदोलन में उनकी भूमिका एक तोड़क की भूमिका रही । ऐसे विफल व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करके चुनाव में उतरना भाजपा के परंपरागत मतदाताओं के विश्वास को भी हिला देने के लिये काफी है ।

और सातवां, नरेन्द्र मोदी की सभा में उम्मीद से बेहद कम लोगों का आना और अरविंद केजरीवाल की सभाओं में भारी भीड़ का उमड़ना ही वह प्रमुख कारण रहा है, जिसकी वजह से मोदी जी ने दिल्ली में खुद को दाव पर लगाना मुनासिब नहीं समझा । किरण बेदी की खोज भी इसीलिये की गई है ।

इसके अलावा,  प्रधानमंत्री और उनके पूरे मंत्रिमंडल, पूरी केंद्रीय सरकार का दिल्ली के चुनाव में इस प्रकार भारी आडंबर के साथ कूद पड़ना जनता की नजरों में भाजपा की जीत को संदिग्ध बनाने और उसकी धार को कुंद कर देने का करतब साबित होगा। हम देख चुके हैं कि जब अरविंद केजरीवाल ने जन-लोकपाल के मुद्दे पर कांग्रेस की मोलभाव न स्वीकारते हुए मुख्यमंत्री पद को त्याग दिया था, उस समय भगोड़ा-भगोड़ा का शोर मचा कर भाजपा वालों ने दिल्ली के लोगों को एक नकली लड़ाई में उलझाने की कोशिश की थी। आज जब चुनाव आ चुका है तब वे उन्हें जनतंत्र के असली मुद्दों की लड़ाई में उतरने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। वे असली बहस से कन्नी काट रहे हैं। अपने को विचारों से ऊपर बता कर जनमत पर आरोपित करना चाहते हैं। राज्य के शीर्ष पर बैठ कर बीन बजाकर शुद्ध रूप से लोगों को नचाना चाहते हैं। आज तक शायद किसी ने भी आम लोगों की मूढ़ता पर विश्वास करके इससे अधिक मूढ़पन के साथ जुए में दाव नहीं लगाया है।

मोदी सरकार को अभी आठ महीने पूरे हुए हैं। इसी बीच उनकी कूटनीति विफलताओं का जैसे एक संपूर्ण वृत्त पूरा करने जा रही है।

सबसे पहले, अपनी ताजपोशी के समय ही उन्होंने पड़ौसी देशों और सार्क को छुआ था। छ: महीने बीतते न बीतते, उनका उत्साह इतने चरम पर चला गया कि नवंबर 2014 में सार्क के 18वें सम्मेलन में उन्होंने उसका दम ही निकाल दिया। अब यह कहना मुश्किल है कि सार्क का अगला सम्मेलन होगा भी या नहीं। पाकिस्तान के साथ तो बातचीत के रिश्ते भी नहीं बचे।

पड़ौसी देशों के बाद 15-16 जुलाई 2014 में ब्राजील के फोर्टालेज़ा और ब्रासीलिया में भारी जोशो-खरोश के साथ वे ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के) सम्मेलन में गये। चारो देश के नेताओं से गलबहियों में वैसा ही उत्साह था जैसा अभी ओबामा के मामले में दिखाई दे रहा है। ब्रिक्स देशों के सुर में सुर मिलाते हुए 100 बिलियन डालर के कोष के साथ न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनबीडी) के गठन की घोषणा से आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक को चुनौती दी। उसका सदर दफ्तर शंघाई में होगा और पहला अध्यक्ष भारत का। सभी क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने की औपचारिकता के साथ बात खत्म होगयी।

ब्रिक्स सम्मेलन के दो महीने बाद ही सितंबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आएं। बंगलौर गये, गुजरात गये, कुछ वाणिज्यिक संधियां की। लेकिन जब वे भारत में थे, उसी समय लद्दाख की सीमा पर भारतीय और चीनी फौज के बीच तनातनी चल रही थी। आज अब स्थिति यह है कि चीन साफ कह रहा है कि वह पाकिस्तान का दामन नहीं छोड़ सकता है। ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री के साथ शी जिनपिंग की गलबहियों से जुड़े विशेष तार टूट गये। चीन ने ओबामा की भारत यात्रा पर छींटाकशी में कोई कोताही नहीं बरती है।

अबतक की इन सारी कूटनीतिक कसरतों के शीर्ष पर आई है ओबामा की यह भारत यात्रा। इसके पहले नवंबर 2014 में ही मोदी जी अमेरिका घूम आये थे और न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वायर पर जो तमाशा किया, उसे याद करते हुए आज भी ओबामा अपने भाषण में हॉलिवुड के नायकों की चर्चा कर रहे थे। ओबामा की भारत यात्रा ही तो वह अंतिम मुकाम था, जहां मोदी जी के अब तक के सारे कूटनीतिक कर्मों को फलीभूत होना था। मोदी जी की कूटनीति के लिये यह कुछ ऐसी ही है, जिसे कहते हैं, अंत भला तो सब भला। अब तक अच्छा-बुरा जो भी क्यों न हुआ हो, अमेरिका अगर मान गया तो फिर भवसागर पार ही समझो। इसीलिये हर प्रोटोकोल और औपचारिकता को बालाएं ताक रख कर उन्होंने खुद अपने हाथों से ओबामा को चाय पिलाई, उन्हें नाम से पुकारा और उनसे अपनी पक्की दोस्ती की बाकायदा घोषणा भी कर दी। तथाकथित परमाणविक संधि, जिसे भूलवश भारतवासियों ने भारत-अमेरिका संबंधों की कुंजी मान लिया है, उसपर अमल की सारी बाधाएं दूर कर दी गयी।

इन सबके बाद भी, अचरज की बात है कि यह सवाल रह गया है - आगे क्या? एक बात साफ हो चुकी है कि परमाणु ऊर्जा संयत्रों की स्थापना तो एक शुद्ध मृग-मरीचिका है। आज के पूरी तरह से बदल चुके ऊर्जा के विश्व-परिदृश्य में भला भारत की ऐसी कौन सी निजी कंपनी होगी, जो अपनी बलि चढ़ाके ऐसे भारी नुकसानदायी प्रकल्पों में अपना हाथ जलायेगी ? रही बात, भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों को सुधारने की, तो यह सिलसिला अपने खुद के तर्कों पर ही सारी दुनिया के देशों के बीच चल रहा है और चलता रहेगा। इसके लिये शायद राष्ट्राध्यक्षों की आपस में गहरी दोस्ती की जरूरत नहीं है।

भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों में भी, हथियारों के उत्पादन और व्यापार को लेकर जो बातें हुई है, उनमें ऐसा नया कुछ नहीं है जो खास तौर पर भारत का ही हित साधता हो। उल्टे, भारत आने के पहले, पाकिस्तान को ओबामा ने जिस प्रकार आश्वस्त सा किया था, उस मनोभाव में किसी प्रकार के परिवर्तन के कोई आसार नहीं दिखाई दिये हैं।

इसमें ग़ौर करने लायक एक बात यह भी है कि ओबामा की भारत यात्रा की ख़बर मिलते ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन भारत का एक तूफ़ानी दौरा (13-14 दिसंबर को) कर गये और एक झटके में रक्षा तथा ऊर्जा को लेकर वे सारे समझौते करा ले गये कि आगे ओबामा के साथ करने के लिये बहुत कुछ शेष नहीं रह गया । भारत की धरती से ओबामा का पुतिन के खिलाफ विष वमन, उन्हें दादागिरी न करने की सलाह देना अकारण नहीं था ।


कुल मिला कर, आसानी से इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि इन आठ महीनों की मोदी की सारी कूटनीतिक पहलकदमियां उनकी राष्ट्रीय नीतियों की तरह ही थोथे दिखावे की ज्यादा रही है। राष्ट्रीय क्षेत्र में ऐसा दिखावा भी प्रचार माध्यमों की कृपा से कुछ दिनों तक चल जाता है, भ्रम बना रहता है, लेकिन कूटनीति के क्षेत्र में विफलताओं की गूंज तत्काल और बड़ी तेजी से सुनाई देने लगती है। इसीलिये, नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय नीतियों की अवहेलना करते हुए कूटनीतिक सफलताओं के बल पर राष्ट्रीय राजनीति में अपने महत्व को बनाये रखने की जो उल्टी चाल चली है, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को बैठा कर अकेले ही बाजी मार लेने की जो हड़बड़ी दिखाई है, उसके दुष्परिणामों को उन्हें जल्द ही भुगतना पड़ेगा। दिल्ली के चुनाव में ओबामा उनकी रक्षा नहीं करेंगे।

हाल में, विदेश सचिव पद से जिस भद्दे ढंग से सुजाता सिंह को एक झटके में विदा किया गया है, यह बताने के लिये काफी है कि अब तक की सारी कूटनीतिक कसरतों के बाद मोदी जी पर विफलता का अवसाद हावी होना शुरू हो गया है। ठीकरा फोड़ा गया है नौकरशाही पर।

सुजाता सिंह का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ था। वे अभी जाने को इच्छुक भी नहीं थी। और तो और, खबरों के अनुसार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से उनकी संगति बैठ गयी थी। उनके काल में विश्व देवता ओबामा का मोदी जी को पांच बार दर्शन का मौका मिला। चीन, रूस और सारी दुनिया के न जाने कितने देशों के राष्ट्रप्रधानों से मोदी जी की सीधी दोस्ती हुई। लेकिन जिस ओबामा यात्रा का झंडा उठा कर मोदी जी दिल्ली का चुनाव जीतने उतरे हुए हैं, उसी के पूरा होते न होते, इस यज्ञ के प्रमुख होता का ही पत्ता साफ कर दिया गया। ओबामा गये और उसके दो दिन बाद ही विदेश सचिव भी गयी। उनकी जगह अमेरिका में वर्तमान राजदूत एस. जयशंकर को ले आया गया है।

सुजाता सिंह ने जाते-जाते एक छोटा सा नोट लिखा है, जिसके बारे में कहते हैं - देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर। अपने इस नोट में उन्होंने लिखा है कि विदेश मंत्रालय एक संस्थान है जिसमें व्यक्ति की नहीं, संस्थान की भूमिका प्रमुख होती है। पिछले दिनों इस संस्थान को जो भी काम सुपुर्द किये गये, उनका पूरी मुस्तैदी के साथ पालन किया गया।

सुजाता सिंह के इस कथन से ही साफ है कि नौकरशाही की जिम्मेदारी नीतियों पर अमल की होती है, नीतियां बनाने की नहीं। नीतियों की सफलता-विफलता का दायित्व राजनीतिक नेतृत्व का है। उन्हें जो करने के लिये कहा गया, उन कामों को उन्होंने सफलता से किया। जाहिर है कि मोदी जी ने विदेश नीति के जरिये स्वदेश को साधने का जो उल्टा रास्ता पकड़ा है, उसके औंधे मूंह गिरने की जिम्मेदारी विदेश मंत्रालय क्यों लेगा। सुजाता सिंह का नोट यही कहता है। भारतीय राजनीति का यह एक बड़ा सबक है कि जिसने भी विदेश नीति को केंद्र में रख कर राष्ट्रीय राजनीति पर निर्णय लिये है, उसके पास सिवाय मूंह के बल गिरने के कोई दूसरा चारा नहीं रहता। खास तौर पर अमेरिका के साथ संबंधों के मसले पर तो और भी नहीं।

सचमुच, जो चीज आसानी से हाथ में आती है, उतनी ही आसानी से चली भी जाती है। दिल्ली से अब उस तूफान के खत्म होने का सिलसिला शुरू हुआ है, जिसने आठ महीने पहले बेखबरी की स्थिति में इस देश को पकड़ लिया था। अब घृणित मध्ययुगीन सांप्रदायिक राजनीति, भूमि अधिग्रहण संबंधी सबसे निकृष्ट अध्यादेश और कॉरपोरेट को सब कुछ सौंप देने की इनकी बदहवासी ने मात्र आठ महीनों में ही इनके सारे उल्लास को अवसाद में बदलना शुरू कर दिया है। दिल्ली चुनाव में इनकी भाव-भंगिमाओं से ऐसा ही प्रतीत होता है।

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

कूटनीतिक विफलताओं की सार्वजनिक स्वीकृति


विदेश सचिव पद से जिस भद्दे ढंग से सुजाता सिंह को एक झटके में विदा किया गया है, यह बताने के लिये काफी है कि अब तक की सारी कूटनीतिक कसरतों के बाद मोदी जी पर विफलता का अवसाद हावी होना शुरू हो गया है। ठीकरा फोड़ा गया है नौकरशाही पर।
सुजाता सिंह का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ था। वे अभी जाने को इच्छुक भी नहीं थी। और तो और, खबरों के अनुसार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से उनकी संगति बैठ गयी थी। उनके काल में विश्व देवता ओबामा का मोदी जी का पांच बार दर्शन का मौका मिला। चीन, रूस और सारी दुनिया के न जाने कितने देशों के राष्ट्रप्रधानों से मोदी जी की सीधी दोस्ती हुई। लेकिन जिस ओबामा यात्रा का झंडा उठा कर मोदी जी दिल्ली का चुनाव जीतने उतरे हुए हैं, उसी के पूरा होते न होते, इस यज्ञ के प्रमुख होता का ही पत्ता साफ कर दिया गया। ओबामा गये और उसके दो दिन बाद ही विदेश सचिव भी गयी। उनकी जगह अमेरिका में वर्तमान राजदूत एस. जयशंकर को ले आया गया है।
सुजाता सिंह ने जाते-जाते एक छोटा सा नोट लिखा है, जिसके बारे में कहते हैं - देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर। अपने इस नोट में उन्होंने लिखा है कि विदेश मंत्रालय एक संस्थान है जिसमें व्यक्ति की नहीं, संस्थान की भूमिका प्रमुख होती है। पिछले दिनों इस संस्थान को जो भी काम सुपुर्द किये गये, उनका पूरी मुस्तैदी के साथ पालन किया गया।
सुजाता सिंह के इस कथन से ही साफ है कि नौकरशाही की जिम्मेदारी नीतियों पर अमल की होती है, नीतियां बनाने की नहीं। नीतियों की सफलता-विफलता का दायित्व राजनीतिक नेतृत्व का है। उन्हें जो करने के लिये कहा गया, उन कामों को उन्होंने सफलता से किया।
जाहिर है कि मोदी जी ने विदेश नीति के जरिये स्वदेश को साधने का जो उल्टा रास्ता पकड़ा है, उसके औंधे मूंह गिरने की जिम्मेदारी विदेश मंत्रालय क्यों लेगा। सुजाता सिंह का नोट यही कहता है।
भारतीय राजनीति का यह एक बड़ा सबक है कि जिसने भी विदेश नीति को केंद्र में रख कर राष्ट्रीय राजनीति पर निर्णय लिये है, उसके पास सिवाय मूंह के बल गिरने के कोई दूसरा चारा नहीं रहता। खास तौर पर अमेरिका के साथ संबंधों के मसले पर तो और भी नहीं।

एक जेहादी सिद्धांतकार स्वपन दासगुप्त


आज (30 जनवरी 2015) के टेलिग्राफ में स्वपन दासगुप्त का लेख Obama’s parting speech will not harm Modi politically : Meeting the foreigner, एक जनूनी सिद्धांतकार की मध्ययुगीन अंधता का जीवंत उदाहरण है। इस्लामिक जेहादी यदि दुनिया की हर चीज को मजहबी राजनीति की नजर से देखते हैं तो हिंदुत्व के उग्रपंथी उनसे जरा भी भिन्न नहीं है। जेहादियों के लिये पश्चिमी जनतंत्र इस्लाम के खिलाफ क्रिश्चियनिटी के सदियों पुराने धर्मयुद्ध का ही एक रूप है; हर आधुनिक जनतांत्रिक विचार इस्लाम के खिलाफ खुली साजिश। इसी आधार पर वे अपने सारे कुकृत्यों के लिये वैधता प्राप्त करते हैं। हूबहू उसी मनोविकृति का दूसरा उदाहरण है स्वपन दासगुप्त का यह लेख।
ओबामा ने सिरिफोर्ट के अपने अंतिम भाषण में भारत के संविधान की धारा 25 का जिक्र किया था। भारतीय संविधान में नागरिकों के जनतांत्रिक अधिकारों से जुड़ी इस जरूरी धारा का उल्लेख मात्र तमाम संघ परिवारियों को नागवार गुजरा और स्वपन दासगुप्त को भी। इसी उन्माद में उन्होंने अपने इस लेख में पश्चिमी प्रभुत्व का एक नया धार्मिक आख्यान रच डाला। विश्व प्रभुत्व की साम्राज्यवादी रणनीति को तुच्छ करके जेहादियों की तरह ही उसे धर्मयुद्ध के मध्ययुगीन प्रतीक में सिमटा दिया। उनके अनुसार बिना ऐसा किये ओबामा की अपने देश की राजनीति में दाल नहीं गल सकती थी। अमेरिकी नेता हमेशा अपने साथ इसाई धर्म का झंडा भी उठाये चलते हैं। उनकी बातों से आपको ऐसा लगेगा मानो भारत के संविधान निर्माताओं ने धारा 25 का निर्माण भारत के नागरिकों के लिये नहीं बल्कि किन्हीं विदेशी हितों को साधने के लिये विशेष तौर पर किया था।
पूरा संघ परिवार गैर-हिंदुओं को भारत में अराष्ट्रीय मानता है। स्वपन दासगुप्त ने इस लेख से साबित कर दिया कि वे भी ऐसा ही मानते हैं। इसीलिये ओबामा द्वारा धारा 25 के उल्लेख मात्र ने उन्हें उत्तेजित कर दिया। ‘धर्मान्तरण और घर वापसी’ वालों के पक्ष में आवाज उठाते हुए वे लिखते हैं उनके कामों ने निश्चित तौर पर political christianity को झकझोरा है। ओबामा के भाषण में उसीकी गूंज सुनाई दे रही है। उनके विरुद्ध स्वपन दासगुप्त ने राजनीतिक हिंदुत्व का झंडा उठाते हुए भी ओबामा की इस यात्रा को मोदी की कूटनीतिक सफलता का उदाहरण बताया है ! स्वपन दासगुप्त को साम्राज्यवाद के आर्थिक प्रभुत्व के किसी भी पहलू से कोई ऐतराज नहीं है, बशर्ते वह राजनीतिक हिंदुत्व को बढ़ावा देता रहे, जैसा कि अमेरिका अक्सर करता भी रहा है। सारी दुनिया के जेहादी समूह अमेरिकी रणनीति की ही उपज रहे हैं। स्वपन दासगुप्त अपने इस लेख में प्रकारांतर से भारत के हिंदू उग्रपंथियों के लिये भी अमेरिका से उसीप्रकार के स्वीकृतिमूलक और उत्साहवद्‍र्धक दृष्टिकोण की मांग भर कर रहे हैं।

थॉमस पिकेटी, मार्क्स और गैर-क्रांतिकारी परिस्थिति में अर्थनीति के संकेतक


अरुण माहेश्वरी

थॉमस पिकेटी, आज अर्थशास्त्र की दुनिया का एक सबसे अधिक चमकता हुआ सितारा है। पिछले साल प्रकाशित हुई उनकी किताब ‘Capital in the Twenty First Century’ ने अर्थनीति संबंधी चिंतन की दुनिया में ऐसी धूम मचा रखी है कि फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलोंद ने 2014 में अपने देश की दो प्रमुख नोबेल-जयी प्रतिभाओं (अर्थशास्त्री ज्यां तिरोले और साहित्यकार पैट्रिक मोदियानो) के साथ ही अपने इस नौजवान, सिर्फ 43 साल की उम्र के अर्थशास्त्री को भी फ्रांस के सर्वोच्च सम्मान Legion d’Honneur (लीजों डिोरा) से नवाजने का निर्णय लिया। लेकिन पिकेटी ने तत्काल यह कह कर इस सम्मान को स्वीकारने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी कि ‘‘यह तय करना सरकार का काम नहीं है कि कौन सम्माननीय है और कौन नहीं। बल्कि सरकार फ्रांस और पूरे यूरोप को अभी के आर्थिक गतिरोध से निकालने पर ध्यान केंद्रित करें।’’

पिकेटी खुद किसी समय फ्रांस की सोशलिस्ट पार्टी के करीबी थे। लेकिन राष्ट्रपति ओलोंद की आर्थिक नीतियों की वजह से ही उन्होंने खुद को सोशलिस्ट पार्टी से दूर कर लिया क्योंकि उनका मानना है कि इन नीतियों के कारण ही फ्रांसीसी अर्थ-व्यवस्था आज गतिरोध का शिकार है और फ्रांस पर कर्ज का बोझ बढ़ता चला जा रहा है। कहना न होगा, पिकेटी ने फ्रांसीसी सरकार के सर्वोच्च सम्मान को ठुकरा कर अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता को हर हाल में कायम रखने के लिये जरूरी सरकारी संरक्षण और संसाधनों के प्रति बौद्धिकों के अपेक्षित नजरिये का एक आदर्श उदाहरण पेश किया है। फ्रांस के इस सर्वोच्च सम्मान को पिछले साल वहां के कार्टूनिस्ट जॉक तार्डी ने ठुकराया था। उसके पहले वामपंथी दार्शनिक ज्यां पाल सात्र्र और रेडियोलॉजी की दुनिया के दो रहनुमा पियेर और मरी क्यूरी भी इसे लेने से इंकार कर चुके हैंं।
पिकेटी की यह किताब, 21वीं सदी में पूंजी,  आय और संपत्ति में गैर-बराबरी के बारे में एक ऐसा राजनीतिक अर्थशास्त्रीय अध्ययन है जो पूरी तरह से ठोस आर्थिक आंकड़ों की गहराई से की गयी जांच-पड़ताल पर आधारित है। पिकेटी और सारी दुनिया में फैले उनके बीसियों विद्वान शोधकर्ता सहयोगियों ने दुनिया के बीस से ज्यादा विकसित और विकासशील देशों की राष्ट्रीय आय, उनके नागरिकों की आय और संपत्ति के बारे में तमाम आंकड़ों को इकट्ठा करके आय और संपत्ति के मामले में दुनिया के विभिन्न देशों में और साथ ही औसतन सारी दुनिया में गैर-बराबरी के जिस इतिहास की रचना की है, उसे अर्थशास्त्र की दुनिया में एक अनूठी उपलब्धि माना जा रहा है। पिकेटी ने इन तथ्यों के आधार पर माल्थुस और युंग से लेकर रेकार्डो तथा मार्क्स के राजनीतिक अर्थशास्त्र की समीक्षा की है, उनकी विशेषताओं और कमजोरियों की ओर संकेत किया है और आगे आने वाले समय में एक गैर-बराबरी से मुक्त समृद्ध समाज के निर्माण के लिये कौन से ठोस उपाय हो सकते हैं, उनके बारे में विचार का एक व्यवहारिक आधार प्रदान किया है। इस किताब की अब तक पचास लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी है। पिकेटी के इस अध्ययन के लिये उन्हें अमेरिका के व्हाइट हाउस में भी विचार के लिये बुलाया गया था।

नोबेल जयी वरिष्ठ अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन ने इस किताब के बारे में न्यूयार्क टाइम्स में लिखा है कि ‘‘

‘‘यह कहना सही लगता है कि फ्रांसिसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी का सबसे प्रमुख ग्रंथ Capital in the Twenty-First Century इस साल की, बल्कि, इस पूरे दशक की, अर्थशास्त्र पर सबसे महत्वपूर्ण किताब मानी जायेगी। आय और संपत्ति के बारे में दुनिया के सबसे प्रमुख विशेषज्ञ पिकेटी ने चंद आर्थिक कुलीनों के हाथ में बढ़ती हुई आय के संकेन्द्रण का दस्तावेज तैयार करने से भी कहीं ज्यादा बड़ा काम किया है। उन्होंने जोरदार दलीलें देकर यह बताया है कि हम ‘पैतृक पूंजीवाद’ के रास्ते पर फिर से लौट रहे हैं, जिसमें अर्थ-व्यवस्था की कमान सिर्फ संपत्तिधारियों के पास नहीं, बल्कि विरासत में मिली संपत्ति के मालिकों के हाथ में होगी, जिसमें आपका जन्म आपकी मेहनत और प्रतिभा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।’’

इसके पहले कि हम पिकेटी के इस अध्ययन के दूसरे सभी उल्लेखनीय पक्षों पर गंभीरता से गौर करें, यहां यह बता देना उचित होगा कि पिकेटी ने अपने इस अध्ययन में जिन आंकड़ों और तथ्यों को अपने लिये सबसे अधिक उपयोगी पाया हैं और जिनका अपने ग्रंथ में उन्होंने सबसे अधिक कारगर ढंग से इस्तेमाल किया है वे सभी दुनिया के तमाम देशों की सरकारों के पास जमा होने वाले आयकर और संपत्ति कर संबंधी नागरिकों के ब्यौरों (रिटर्न) से निकल कर आने वाले सरकारी तथ्य और आंकड़ें हैं। इनके जरिये उन्होंने बाकायदा नागरिकों की निजी आय और संपत्तियों के रूप में होने वाले परिवर्तनों, उतार-चढ़ावों का एक ब्यौरेवर चित्र प्रस्तुत किया है और उस पर उन देशों तथा सारी दुनिया की सामान्य ठोस राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में विवेचन किया है। इस पूरे विवेचन में अटकलबाजी अथवा वैचारिक पूर्वाग्रहों की भूमिका बिल्कुल नहीं के बराबर है और इसी अर्थ में यह पहले के तमाम महान राजनीतिक अर्थशास्त्रियों से अलग भी है। आयकर और संपत्ति कर संबंधी इन आंकड़ों की उपलब्धता के बिना आय और संपत्ति में गैर-बराबरी के रहस्य को शायद ही कभी माकूल ढंग से भेदा जा सकता था।

इस बात का उल्लेख हम पहले इसलिये कर देना चाहते हैं, क्योंकि हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं, जहां पिछले चुनाव के पहले बाबा रामदेव नामक शख्स ने आयकर मात्र को ही खत्म कर देने का प्रस्ताव रखा था और उस दौरान उनके इस ‘क्रांतिकारी’ सुझाव को वर्तमान वित्तमंत्री अरुण जेटली और पूरे संघ परिवार का परोक्ष रूप से समर्थन भी मिला था। आज थॉमस पिकेटी के अध्ययन को देखकर ऐसा लगता है कि अगर रामदेव जैसों के सुझाव को मान लिया जाए तो यह भारत की अर्थनीति को किसी आदिम युग, बल्कि जंगल युग में ले जाने जैसा कुकृत्य होगा। शिक्षा और संस्कृति के सभी विषयों पर आज संघ परिवार जिसप्रकार दीनानाथ बतरा और सुदर्शन राव जैसे लोगों के जरिये वैज्ञानिक शोध के बजाय अंधविश्वासों से भरे आदिम सोच को प्रोत्साहित करने में लगा हुआ है, ठीक वैसे ही  रामदेव कंपनी का प्रस्ताव अर्थनीति के क्षेत्र में एक आदिम और जंगल युग की वापसी का विचार था। यह हमारे नीतिकारों को एक घनघोर अंधेरे युग में धकेल देने का प्रस्ताव था।

बहरहाल, पिकेटी की इस किताब का महत्व इस बात में है कि उन्होंने इसमें सम्पत्ति के आबंटन के मुद्दे को विचार का विषय बनाया है जिसे अर्थनीतिशास्त्र का सबसे चर्चित और विवादास्पद किन्तु एक मूलभूत विषय कहा जा सकता है। संपत्ति के उत्पादन के साथ ही संपत्ति के वितरण का इतिहास सामाजिक विकास की दृष्टि से कम महत्वपूर्ण नहीं है। मार्क्स का मानना था कि निजी पूंजी का अपना अंतर्निहित चरित्र और गठन ही कुछ ऐसा है कि उसके चलते अनिवार्य तौर पर संपत्ति का मुट्ठी भर लोगों के पास संकेंद्रण होता चला जाता है। पिकेटी ने अपनी किताब में यह सवाल उठाया है कि क्या यह बात पूरी तरह सच है ? उन्नीसवीं सदी में माक्र्स के इस सोच के विपरीत बीसवीं सदी में अमेरिकी अर्थशास्त्री साइमन कुजनर्स ने कहा कि आर्थिक अभिवृद्धि (growth), प्रतिद्वंद्विता तथा तकनीकी प्रगति की तरह की दूसरी संतुलनकारी शक्तियां विकास के परवर्ती चरणों में गैर-बराबरी को स्वत:स्फूर्त ढंग से कम करती हैं तथा समाज में विभिन्न वर्गों के बीच ज्यादा सामंजस्य पैदा करती है। पिकेटी पूछते हैं कि इन दो प्रकार के बिल्कुल विपरीत निष्कर्षों का आधार क्या है ? और फिर कहते हैं कि अठारहवीं सदी से लेकर अब तक की संपत्ति और आय के विकास की यथार्थ कहानी को हम जानते ही कितना है। इस बारे में ठोस तथ्यों की जानकारी के आधार पर ही हम आज की सदी और आगे के बारे में कोई सही निष्कर्ष तक पहुंच सकते हैं और सही शिक्षा ले सकते हैं।

पिकेटी ने अपनी किताब में इन्हीं चंद सवालों के उत्तर तलाशने की एक कोशिश की है। वे मानते हैं कि इन सवालों का उन्होंने कोई पक्का और अकाट्य उत्तर पा लिया है, इसका तो वे दावा नहीं कर सकते। लेकिन इन सवालों के जो भी जवाब उन्होंने हासिल किये हैं, वे किसी अटकलबाजी पर नहीं, बल्कि उन व्यापक ऐतिहासिक और तुलनात्मक आंकड़ों पर आधारित है, जो आंकड़ें इतनी प्रभूत मात्रा में पहले के शोधकर्ताओं को उपलब्ध ही नहीं थे। बीस से ज्यादा देशों के संबंध में संग्रहीत व्यापक आंकड़ों और उनकी गणना के नये सैद्धांतिक ढांचों और तकनीकी विधियों के प्रयोग से उनके अंदर से जाहिर होने वाली सामाजिक क्रियाशीलता की जो गहरी समझ हासिल की जा सकती है, वह शायद पहले संभव नहीं थी। यहां उल्लेखनीय है कि पिकेटी ने अपने इस काम में सारी दुनिया के कई प्रमुख शोधकर्ताओं की सेवाओं का उपयोग किया है जिनमें भारतीय मूल के शोधकर्ता अभिजीत बनर्जी भी शामिल हैं, जिनकी एस्थर डुफ्लो के साथ मिल कर लिखी गयी पुस्तक ‘Poor Economics & rethinking poverty & the ways to end it’ (2011) ने भी सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था।

पिकेटी कहते हैं कि मार्क्स ने पूंजीवाद के चलते समाज में पैदा होने वाले आर्थिक गतिरोध, और सामाजिक अन्तर्विरोधों की तीव्रता के कारण जिस प्रकार के सामाजिक विस्फोट की भविष्यवाणी की थी, उससे तो आर्थिक अभिवृद्धि के बल पर दुनिया अभी बच गयी है, लेकिन इस बचाव से पूंजी के आंतरिक ढांचों में, structures में कोई बदलाव नहीं आया है और न ही उनसे पैदा होने वाली गैर-बराबरी की सचाई बदली है, जिसकी उम्मीद द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की परिस्थितियों में इधर के सालों में अमेरिकी अर्थशास्त्री साइमन कुजनेत्स वगैरह के द्वारा की जारही थी। इसके विपरीत, वे कहते हैं कि जब भी पूंजी से होने वाले मुनाफे की दर उत्पादन और आय में अभिवृद्धि की दर से ज्यादा होती है, तभी पूंजीवाद जैसे स्वत:स्फूर्त ढंग से निरंकुश (arbitrary) और न चलने लायक (unsustainable) गैर-बराबरियों को पैदा करने लगता है, जैसा कि 19वीं सदी में हुआ था, और वही स्थिति उन्हें आज 21वीं सदी में दिखाई दे रही है। ऐसे काल में प्रतिभाओं की कोई कीमत नहीं रह जाती जिस पर कोई भी जनतांत्रिक समाज टिका होता है।

गौर करने लायक बात है कि पिकेटी ने तथ्यों पर आधारित अपने अध्ययन के बल पर ‘न चलने लायक’ और ‘निरंकुश’ गैर-बराबरियों के मामले में 19वीं सदी, अर्थात मार्क्स के काल की तुलना 21वीं सदी के वर्तमान काल से की है। इसीलिये यह बेवजह नहीं है कि आज सारी दुनिया के आर्थिक और दार्शनिक चिंतन के केंद्र में फिर एक बार माक्र्स छाये हुए हैं। कम्युनिस्ट घोषणापत्र की पहली पंक्ति में ही माक्र्स ने जो कहा था कि ‘आज पूरे यूरोप को एक भूत आतंकित कर रहा है - कम्युनिज्म का भूत’, उसीप्रकार आज के, अर्थात 21वीं सदी के समूचे आर्थिक-बौद्धिक विमर्श पर, जिसमें पेशेवर अर्थशास्त्री से लेकर आज की दुनिया के उदीयमान, बौद्धिक तौर पर प्रखर उद्योगपति भी शामिल है, मार्क्स के विचारों का भूत छाया हुआ है और उनके उल्लेख के बिना कोई भी आज की दुनिया की गुत्थियों के बारे में कायदे की कोई बात कहने में अपने को असमर्थ पाता हैं।

बहरहाल, इसी परिप्रेक्ष्य में पिकेटी ने अपने इस ग्रंथ में उन तमाम उपायों की भी चर्चा की है जिनसे जनतंत्र पूंजीवाद के इस आंतरिक, संपत्ति और आय की गैर-बराबरी पैदा करने वाले स्वरूप को नियंत्रित कर सके और यह सुनिश्चित कर सके कि राज्य की नीतियों को निर्धारित करते समय सामान्य नागरिक हितों को निजी हितों की तुलना में प्राथमिकता दी जायेगी। और, इसके साथ ही अर्थ-व्यवस्था का खुलापन भी जारी रखा जा सके, संरक्षणवादी (protectionist) और राष्ट्रवादी (nationalist) प्रतिक्रियाओं से बचा जा सके। इसीलिये पिकेटी के इस ग्रंथ को सारी दुनिया में आर्थिक चिंतन की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।

यहीं पर यह भी उल्लेखनीय है कि पिकेटी उन अर्थशास्त्रियों में हैं जिनकी 1989 में जब एक ओर फ्रांसीसी क्रांति की 200वीं सालगिरह मनाई जा रही थी और दूसरी ओर बर्लिन की दीवार को ढहाया जा रहा था अर्थात समाजवादी शिविर के अंत की घोषणा की जा रही थी, उनकी उम्र सिर्फ 18 साल की थी। इसीलिये खुद उनके कहे अनुसार, उनमें सोवियत संघ और समाजवादी व्यवस्था को लेकर कभी किसी प्रकार का मोह नहीं रहा। न उनमें पूंजीवाद-विरोध की बैठे-ठाले की जाने वाली बातों के प्रति कोई आकर्षण है। वे अहद लेकर गैर-बराबरी की निंदा में भी नहीं उतरे हुए है। उन्हें गैर-बराबरी भी एक हद तक स्वीकार्य है जहां तक वह 1789 की मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा के अनुसार जनहित पर आधारित हो, यद्यपि ‘जनहित’ के बारे में उस घोषणा में की गयी परिभाषा बहुत स्पष्ट नहीं है। वे साफ कहते हैं कि मेरी दिलचस्पी सिर्फ सुचारु और स्वस्थ ढंग से समाज के संचालन में है। उन्होंने अमेरिका में अपना शोध करके डाक्टरेट किया था लेकिन अस्सी के दशक में ही फ्रांसीसी विश्वविद्यालयों में अर्थशास्त्र को उसकी आत्मलीनता से मुक्त करने, गणितीय अथवा सैद्धांतिक मतिग्रस्तता से निकालने का जो आंदोलन चला था, उसका निश्चित प्रभाव उनके निर्माण में दिखाई देता है।  

बहरहाल, पिकेटी ने अपने अध्ययन की पृष्ठभूमि के रूप में सरसरी तौर पर राजनीतिक अर्थशास्त्र के अब तक के इतिहास पर एक नजर डाली है। वे प्रारंभ करते हैं माल्थस, युंग और फ्रांसीसी क्रांति से, अर्थात 18वीं सदी के अंतिम काल और 19वीं सदी के प्रारंभिक सालों से, जब पहली बार इंगलैंड और फ्रांस में आय और संपत्ति के आबंटन का सवाल राजनीतिक अर्थशास्त्र के विमर्श के केंद्र में आगया था। औद्योगिक क्रांति के चलते देहातों के गरीब शहरों में आकर जमा होने लगे थे। यह एक प्रकार का सामाजिक भूचाल था। उन्हीं दिनों युंग की फ्रांस के सुदूर इलाकों की एक यात्रा डायरी प्रकाशित हुई, जिसमें वहां के देहातों में भयावह गरीबी के चित्र खींचे गये थे। तब फ्रांस ही यूरोप में सबसे अधिक आबादी का देश था। फ्रांस की आबादी दो करोड़ थी जबकि इंगलैंड की आबादी सिर्फ अस्सी लाख। और, इसी सबसे बड़ी आबादी वाले फ्रांस में 1789 की फ्रांसीसी क्रांति हुई जिसके चलते वहां की विधायी सभा में कुलीनों के साथ-साथ साधारण जनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। युंग इस घटना को समाज के लिये एक भारी तबाही का संकेत मानते थे। वे फ्रांस की क्रांति से आतंकित थे।

कुलीनों के इसी आतंक की गूंज इंगलैंड में राजनीतिक अर्थशास्त्र के विमर्श में सुनाई देने लगी और यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि आबादी के विस्फोट से पूरे सामाजिक ढांचे, यूरोप के राजनीतिक संतुलन पर क्या असर पड़ेगा ? फ्रांस की क्रांति को वहां की आबादी के अनुपात से जोड़ कर देखा जा रहा था। इसी पृष्ठभूमि में माल्थस का प्रसिद्ध 1798 का निबंध आया - Essay on the principle of population।  वे युंग से भी कहीं ज्यादा इस पूरे घटनाक्रम से डरे हुए थे। इंगलैंड में इसकी पुनरावृत्ति न होने पाए, इसके लिये उन्होंने गरीबों को दी जाने वाली हर मदद को तत्काल रोक देने, उनके प्रजनन को ही नियंत्रित करने की बात की ताकि अति-आबादी से पैदा होने वाली अराजकता और दुर्दशा से बचा जा सके।

पिकेटी ने इस बात का उल्लेख करते हुए कहा है कि माल्थस और युंग के सोच के केंद्र में संपत्ति के आबंटन से जुड़े सवाल ही काम कर रहे थे जिसमें वे भारी तबाही की आशंका कर रहे थे। इसके बाद ही पिकेटी रेकार्डो और कार्ल मार्क्स की चर्चा करते हैं। इन दोनों की निगाहें भी उत्पादन और आमदनी के साधनों की मिल्कियत के सवाल पर टिकी हुई थी। रेकार्डो जमीन के संकेन्द्रण के जरिये संपत्ति को सामंती तबकों के पास सिमटते हुए देखते हैं और मार्क्स औद्योगिक क्रांति के कारण पूंजीपतियों के पास।
सन् 1817 में रेकार्डो की किताब आई - Principles of Political Economy and Taxation। एक यहूदी महाजन के घर में जन्मे रेकार्डो के सामने अपने समय के पूंजीवाद की प्रव्त्तियों की एक साफ तस्वीर थी। उन्हें लगता था कि जैसे-जैसे उत्पादन और संपत्ति बढ़ेंगे, भूमि अन्य चीजों की तुलना में एक अनमोल चीज होती चली जायेगी। इससे अंतत: सामंतों के हाथ में राष्ट्रीय आमदनी का अधिकांश हिस्सा सिमटता जायेगा। ऐसा न होने पायें, इसीलिये उन्होंने जमींदारों पर उनकी संपत्ति के अनुसार ज्यादा से ज्यादा कर लगाने की बात कही। वे मानते थे कि समाज में किसी भी वस्तु की कीमत की बड़ी भूमिका होती है, लेकिन मूल्य को आंकने की न कोई सीमा होती है और न ही कोई नैतिकता। इसीके चलते संपत्ति चंद हाथों में सिमटती जाती है, सामाजिक संतुलन बिगड़ जाता है और फ्रांसीसी क्रांति की तरह की भारी सामाजिक तबाही मचती है।

पिकेटी कहते हैं ‘‘लेकिन हमेशा की तरह ही सबसे बुरी स्थिति का आना भी सुनिश्चित नहीं होता है।’’
रेकार्डो के विपरीत, मार्क्स  ने पूंजीवाद के अन्तर्गत पूंजीपतियों के हाथ में एक प्रकार के अनंत संचय (infinite accumulation) के अंतर्निहित सच को देखा था। और इसीके अनिवार्य परिणाम के तौर पर उन्होंने सामाजिक क्रांति की भविष्यवाणी की थी।

मार्क्स के इस प्रसंग में पिकेटी का कहना हैं कि मार्क्स के जमाने तक जिस दर से सामाजिक गैर-बराबरी बढ़ रही थी, जिसका एक चित्र इंगलैंड के मजदूर वर्ग की दशा के बारे में एंगेल्स की किताब में देखने को मिलता है, वह 1870 से 1914 (प्रथम विश्वयुद्ध के समय) तक जैसे एक जगह आकर थम सी गयी थी। 1840 के जमाने में जब कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखा गया था उस समय तक औद्योगिक मुनाफा तो लगातार बढ़ रहा था लेकिन श्रम की आमदनी जस की तस पड़ी थी। इसी पृष्ठभूमि में कम्युनिस्ट आंदोलन का जन्म हुआ। पूंजी का मुनाफा बढ़ता है लेकिन मजदूर वर्ग की दशा में कोई सुधार नहीं होता। और, इसीलिये मार्क्स ने सामाजिक क्रांति के जरिये बुर्जुआ की पराजय और सर्वहारा की विजय की अनिवार्यता की भविष्यवाणी की थी। यह पूंजीवादी अर्थ-व्यवस्था के आंतरिक अंतर्विरोंधों की एक तार्किक परिणति थी। माक्र्स की यह भविष्यवाणी पूंजी के संकेंद्रण और मुफलिसी के विस्तार के संदर्भ में सच के सबसे ज्यादा करीब थी।

लेकिन पिकेटी ने संग्रहीत आंकड़ों से पाया कि 19वीं सदी के अंतिम सालों में, कोई भी कारण क्यों न हो, इस लगातार बढ़ रही गैर-बराबरी में एक ठहराव आगया। मजदूरों की क्रयशक्ति में वृद्धि ने पूरे परिदृश्य को बदलना शुरू कर दिया। कम्युनिस्ट क्रांति हुई लेकिन वह यूरोप के सबसे पिछड़े हुए देश में। इसके बारे में पिकेटी कहते हैं कि मार्क्स ने तकनीकी क्रांति को देखा था लेकिन तकनीक की प्रगति के टिकाऊ रूप को वे पकड़ नहीं पाये थे, जिसका संचय की प्रक्रिया और निजी पूंजी के संकेंद्रण के प्रभाव के विपरीत एक प्रकार का निराकरणकारी प्रभाव पड़ रहा था। पिकेटी का कहना है कि इस बात को पकड़ने के लिये मार्क्स के पास जरूरी आंकड़ें उपलब्ध नहीं थे। इसके अलावा, कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र के साथ उन्होंने अपने को एक राजनीतिक लक्ष्य से भी जोड़ लिया था जिसके चलते उन्होंने अपने समय के सभी दूसरे संकेतों की और गहराई से जांच करना जरूरी नहीं समझा। पिकेटी की एक राय यह भी है कि मार्क्स ने इस बात पर ज्यादा गहराई से गौर करने की कोशिश नहीं की कि जिस समाज में निजी पूंजी का पूरी तरह से खात्मा हो जायेगा, उस समाज का वास्तविक आर्थिक और राजनीतिक स्वरूप क्या होगा ? उनके अनुसार, यह एक बहुत ही जटिल सवाल है क्योंकि अब तक का अनुभव यही बताता है कि जिस समाज में भी निजी पूंजी खत्म हुई है वहीं पर सर्वाधिकारवादी राज्य के दुखांतकारी प्रयोग हुए हैं।

मार्क्स के निष्कर्षों की इन सीमाओं के बावजूद, पिकेटी पूंजी के बारे में उनके विश्लेषण को पूरी तरह से वैध मानते हैं। मार्क्स ने पूंजीवाद के तहत पूंजी के अनंत संचय के बारे में जो अन्तरदृष्टि प्रदान की, उससे 21वीं सदी के पूंजीवाद का उसी प्रकार अध्ययन हो सकता है जैसा कि उन्होंने खुद 19वीं सदी तक के पूंजीवाद का किया था। आबादी और उत्पादन में अभिवृद्धि (growth) की दर यदि कम होगी और संपत्ति के बेहिसाब संचय का अबाध सिलसिला जारी रहेगा तो वह समाज को अस्थिर कर देने के लिये काफी होगा। कहने का तात्पर्य यह कि कम दर से अभिवृद्धि होने पर मार्क्स ने जिस तबाही की भविष्यवाणी की थी, उसे झुठलाया नहीं जा सकता।

पिकेटी बताते हैं कि 19वीं सदी के अनुभवों के आधार पर रेकार्डो और मार्क्स जो भविष्यवाणी कर रहे थे, ठीक उसके विपरीत 20वीं सदी में अमेरिकी अर्थशास्त्री साइमन कुजनेत्स बिल्कुल परियों के देश की कहानी सुनाने लगे थे। वे कह रहे थे कि पूंजीवादी विकास के आगे बढ़े हुए चरणों में आय की गैर-बराबरी स्वत:स्फूर्त ढंग से कम होती जायेगी। वह सन् 1955 का जमाना था, युद्ध के बाद का जादूई समय, ब्रेटनवुड्स संस्थाओं और यूरोप के पुनर्गठन की मार्शल योजना का समय था। 1945 से 1975 के बीच के इस काल को फ्रांस में तीस शानदार वर्षों (Trente Glorieuses’) के रूप में याद किया जाता है। इन चंद सालों के अनुभव के आधार पर कुजनेत्स दुनिया को बता रहे थे कि ‘‘अभिवृद्धि एक ऊपर उठती हुई लहर है जो अपने साथ सभी नौकाओं को ऊपर उठायेगी’’। सिर्फ धीरज रखने की जरूरत है, सबके दिन फिरेंगे। अभिवृद्धि की इस यात्रा में उत्पादन, मुनाफा, आमदनी, मजदूरी, पूंजी, संपत्ति की कीमतें आदि सब समान गति से बढ़ेंगे जिनसे समाज के सभी तबकों को समान रूप से लाभ मिलेगा।

इसप्रकार, रेकार्डों और मार्क्स ने जिस विषमता के उध्र्वगति से बढ़ते चक्र के आधार पर 19वीं सदी में सामाजिक विप्लव की बात कही थी, कुजनेत्स अपने विश्लेषण से उनके बिल्कुल विपरीत छोर पर खड़े थे।
पिकेटी बताते हैं कि कुजनेत्स का यह अभिवृद्धि से आय और संपत्ति की गैर-बराबरी में कमी का सिद्धांत ऐसा पहला सिद्धांत था जो कुछ हद तक प्रामाणिक सांख्यिकी पर आधारित था। पहली बार उन्होंने अमेरिका में लोगों की आय संबंधी आंकड़ों को आधार बना कर अपनी बात रखी थी। अमेरिका में 1913 में ही आयकर लागू किया गया था। उसके पहले तो किसी के पास भी नागरिकों की आमदनी को जानने का कोई प्रामाणिक स्रोत ही नहीं था। आयकर और संपत्तिकर के आंकड़ों के बिना आय और संपत्ति के मामले में गैर-बराबरी में वृद्धि अथवा गिरावट को कूतने का कोई प्रामाणिक तरीका उपलब्ध नहीं था। राष्ट्रीय आय में ऊंची आय वाले तबकों का कितना हिस्सा है, इसकी जानकारी आयकर रिटर्न के तथ्यों से ही मिल सकती थी।

कुजनेत्स ने इन आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पाया कि 1913 से 1948 के बीच अमेरिका में आय के मामले में गैर-बराबरी काफी कम हुई है।

माल्थस, रेकार्डो, मार्क्स कह रहे थे कि गैर-बराबरी भयावह रूप से बढ़ रही है लेकिन उनके पास इसके ठोस आंकड़ें मौजूद नहीं थे। इसके विपरीत कुजनेत्स के पास कुछ आंकड़ें उपलब्ध थे और वे यह सुखदायी समाचार दे रहे थे कि गैर-बराबरी कम हो रही है। वे अर्थ-व्यवस्था में विकास और आर्थिक गैर-बराबरी के आंकड़ों से जो ग्राफ पेश कर रहे थे, उसका आकार एक घंटी की तरह था, कुजनेत्स कर्व। इसमें बताया जारहा था कि आर्थिक अभिवृद्धि में पहले गैर-बराबरी बढ़ेगी और फिर औद्योगीकरण और आर्थिक विकास के साथ-साथ, धीरे-धीरे एक समय के अंतराल पर कम होगी। वे इसे माक्र्स के पूंजी के अन्तर्निहित तर्क की तुलना में आर्थिक विकास का अन्तर्निहित तर्क बता रहे थे। सन् 1953 में कुजनेत्स की किताब आई - Shares of upper incoms and savings। इसमें उन्होंने आंकड़ों को जिस प्रकार पेश किया उनका आगे सारी दुनिया में एक बड़े राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया, जबकि खुद कुजनेत्स ऐसे निष्कर्ष तक पहुंचने का एक प्रकार की अटकलबाजी ही मानते थे। पिकेटी बताते हैं कि काफी अंश तक कुजनेत्स कर्व का सिद्धांत शीत युद्ध की राजनीति की एक उपज था।

1914 से लेकर 1945 के बीच धनी देशों में गैर-बराबरी में कमी को कुजनेत्स आर्थिक विकास का एक अन्तर्निहित तर्क कह रहे थे, उसे ही पिकेटी दो विश्व युद्धों  और उनसे पैदा होने वाले आर्थिक और राजनीतिक झटकों का परिणाम बताते हैं। वे कहते हैं कि इस दौरान समाज के बड़े भाग्यवानों के हितों को खासा झटका लगा था। कुजनेत्स इसके कारण के तौर पर पूंजी की एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में गतिशीलता (inter-sectoral mobility) की जिस स्वत:स्फूर्त शांत प्रक्रिया की चर्चा करते हैं, उसका गैर-बराबरी में इस कमी से कोई संबंध नहीं है।

बहरहाल, राजनीतिक अर्थशास्त्र के इस समूचे ऐतिहासिक विमर्श को पिकेटी इसलिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि इसने आय और संपत्ति के वितरण (distribution) के सवाल को अर्थनीतिशास्त्र का एक केंद्रीय सवाल बना दिया। इसी प्रश्न की रोशनी में अपनी किताब में उन्होंने 21वीं सदी में पूंजी के यथार्थ के बारे में छान-बीन करके कुछ नतीजों का अनुमान लगाने की कोशिश की है। वे अपने संग्रहीत आंकड़ों के आधार पर बताते हैं कि 1970 के बाद से दुनिया के धनी देशों में, खासकर अमेरिका में आय की गैर-बराबरी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। 21वीं सदी के प्रारंभ के सालों में यह संकेंद्रण और भी ज्यादा गति से बढ़ते हुए 20वीं सदी के दूसरे दशक के स्तर तक चला गया है। इसी तथ्य के आधार पर वे कहते हैं कि बीच के कुछ सालों तक गैर-बराबरी बढ़ने के बजाय कम क्यों हुई इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। इसके कारण पूंजीवादी विकास के किसी अन्तर्निहित नियम में नहीं, बल्कि उसके बाहर की राजनीतिक-सामाजिक घटनाओं में छिपे हुए हैं।

वे बताते हैं कि चीन की तरह के एक गरीब और विकासशील देश के विकास ने विश्व-स्तर पर गैर-बराबरी को कम करने में एक भूमिका अदा की है। लेकिन इसकी वजह भी वही रही है जो 1945 से 1975 के बीच यूरोपीय धनी देशों में गैर-बराबरी में वृद्धि के रुकने की वजह रही है। लेकिन सभी धनी देशों में वित्तीय बाजार, तेल के बाजार और रीयल इस्टेट में मनमानी कीमतें वसूले जाने की वजह से जो असंतुलन पैदा हुआ है और जिसने फिर से गैर-बराबरी में वृद्धि की गति को तेज कर दिया है, वह कुजनेत्स जैसे ‘संतुलित विकासपथ’ के सिद्धांतकारों की पूरी समझ को संदेह के दायरे में ले आती है। आज सबको यह सवाल सताने लगा है कि क्या 2050 से 2100 के बीच की दुनिया पर बड़े व्यापारियों, वित्तीय प्रबंधकों, अति-धनाढ्यों (super rich), तेल उत्पादक देशों और बैंक आफ चायना का कब्जा होगा ? या फिर कर-स्वर्गों (tax heavens) में पनाह लिये बैठै वित्तशालियों का कब्जा होगा ?

पिकेटी की साफ राय है कि बिना इस सवाल से दो-चार हुए कि आगे कौन किस पर कब्जा करने वाला है, सिर्फ यह मान लेना कि विकास (growth) अन्तत: ‘संतुलन’ पैदा कर देगा, एक मूर्खतापूर्ण सोच है। ऐसा मानने का कोई भी ठोस आधार नहीं है। खास तौर पर आज, जब सारे तथ्य यह बता रहे हैं कि घूम-फिर कर हम फिर उसी जगह आ खड़े हुए हैं जहां 19वीं सदी में हमारे पूर्वज खड़े थे। धन में वृद्धि जितनी बेतहाशा हो रही है, उतनी ही गति से आय और संपत्ति का संकेंद्रण बढ़ रहा है और व्यापक जनता का जीवन अपरिवर्तित रह रहा है।

इसीलिये पिकेटी मानते हैं कि रेकार्डों, मार्क्स आदि ने भले ही अपने प्रश्नों के पूरी तरह से संतोषप्रद जवाब न दिये हो, लेकिन उन्होंने सवाल बिल्कुल सही उठाये थे। उन्होंने राजनीतिक अर्थशास्त्र के केंद्रीय विषय के रूप में वितरण के प्रश्न को रखा था और वे इसके दीर्घकालीन सामाजिक दुष्परिणाम साफ तौर पर देख रहे थे। खास तौर पर माक्र्स ने पूंजीवाद की अपनी गति के नियम को, धन के अनंत संकेंद्रण की प्रक्रिया को ठोस रूप में पहचान लिया था जो आज भी उतना ही वैध है जितना 19वीं सदी के उत्तराद्र्ध में था। कुजनेत्स की तरह के झूठे आशावादी निष्कर्षों से खुशफहमी जरूर पैदा हो सकती है, अर्थनीति के अन्तर्निहित नियमों का कोई अंदाज नहीं मिलता। कुजनेत्स ने अर्थनीति का भला सिर्फ एक मायने में किया कि उन्होंने आय और संपत्ति के उपलब्ध आंकड़ों के जरिये समाज में गैर-बराबरी को मापने के ठोस औजारों को अर्थनीतिशास्त्र का विषय बनाया।

पिकेटी ने अपने इस अध्ययन में कुजनेत्स के काम को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रदान किया है। आयकर और संपत्तिकर संबंधी आंकड़ों से गैर-बराबरी के क्रम को दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में समझने की एक प्रविधि का विकास किया है। अपने अध्ययन में पिकेटी बताते हैं कि इस दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में देखने पर ही यह बात साफ जाहिर होती है कि आय का एक स्रोत यदि मानव श्रमशक्ति है तो दूसरा उतना ही महत्वपूर्ण स्रोत संपत्ति भी है। वेतन, मजूरी, बोनस तथा ऐसी ही दूसरी आमदनियां श्रम से पैदा होती है और किराया, लाभांश, ब्याज, मुनाफा, पूंजीगत लाभ का स्रोत अमूमन संपत्ति होती है।

इसप्रकार, पिकेटी स्थापित करते हैं कि आर्थिक नियतिवादी नजरिये से गैर-बराबरी को कम करने की दिशा में एक कदम भी नहीं बढ़ा जा सकता है। 1910 से 1950 के बीच के सालों में इसपर मामूली अंकुश लगने के पीछे आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक कारण ही प्रमुख थे। इसीलिये राजनेताओं की प्रतिबद्धताएं, उनके सोच और रुझानों का गैर-बराबरी में वृद्धि को रोकने तथा उसे कम करने में भारी महत्व है। यही स्थिति संपत्ति के मामले में गैर-बराबरी को लेकर भी है। इस दिशा में सिर्फ व्यापार के लिये सीमाओं को खोलने के बजाय ज्ञान के अधिक से अधिक विस्तार से, एक प्रकार के तकनीकी विवेक के प्रसार से कुछ अग्रगति हासिल की जा सकती है।

पिकेटी वर्गयुद्ध बनाम कम विभाजनकारी पीढि़यों के संघर्ष की तरह की असंगत बहसों को खड़ा करने वालों के आशावाद को भी भ्रामक बताते है। ‘जवानी में कमाते हैं सुरक्षित बुढ़ापे के लिये’ की तरह के जीवनदर्शन के चलते सूदखोरों के वंशधरों और मजदूरों के वंशधरों के बीच संपत्ति और आय की गैर-बराबरी का विषय गौण हो जायेगा। कहा जा रहा है कि इससे पूंजी का मूल सामाजिक चरित्र ही बदल जायेगा।

पिकेटी तथ्यों के आधार पर यह बताते हैं कि राष्ट्रीय आय में श्रम का हिस्सा लंबी कालावधि में बढ़ता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। 18वीं, 19वीं सदी की तरह ही 21वीं सदी में भी ‘गैर-मानवीय’ (non-human) पूंजी से कोई मुक्ति नहीं है और इसका कोई कारण नहीं दिखाई देता कि आगे भी यही जारी नहीं रहेगा। अतीत की तरह ही अब भी संपत्ति की गैर-बराबरी का आयुवर्ग से कोई संबंध नहीं है। विरासत में मिली संपत्ति 21वीं सदी के प्रारंभ में भी उतनी ही निर्णायक है जितनी बाल्जक के Pere Goriot के समय में थी। हां, इस पूरे काल में अगर किसी चीज में थोड़ी समानता आई है तो वह है ज्ञान और दक्षता के क्षेत्र में समानता। पिकेटी इसे ही, ज्ञान और दक्षता के विस्तार को आगे गैर-बराबरी पर काबू पाने के औजार के रूप में कुछ अंश तक जरूर देखते हैं। इसी आधार पर वे साफ देखते हैं कि शिक्षा और प्रशिक्षण पर निवेश को रोक कर किसी भी समुदाय को आर्थिक विकास के लाभों की हिस्सेदारी से वंचित किया जा सकता है। इसीलिये दुनिया में समरसता कभी भी स्वाभाविक या स्वत:स्फूर्त ढंग से नहीं आ सकती है। इसका एक गहरा संबंध राज्य की शिक्षा नीति से है।

‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका के ताजा 24 जनवरी के अंक में  अमेरिका के नये आभिजात्यों (America’s new aristocracy) पर जो सामग्री आई है, वह भी यह बताती है कि शिक्षा के मामले में भेद-भाव से अमेरिका में एक नये आभिजात्य वर्ग को पैदा किया जा रहा है। ‘‘Middle-class students have to rack up huge debts to attend college, especially if they want a post-graduate degree, which many desirable jobs now require. The link between parental income and a child’s academic success has grown stronger, as clever people become richer and splash out on their daughter’s Mandarin tutor, and education matters more than it used to, because the demand for brainpower has soured.”

पिकेटी का निष्कर्ष है कि जब भी पूंजी पर होने वाला मुनाफा अर्थ-व्यवस्था में विकास की दर से ज्यादा होने लगता है (जैसा कि 19वीं सदी के पहले तक और अब 21वीं सदी में हो रहा है), तब स्वाभाविक तौर पर पैतृक संपत्ति उत्पादन और आमदनी की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ती है, वह जीवन में अर्जित संपत्ति पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेती है। आभिजात्य वर्ग तभी पैदा होता है।

इन सबके बावजूद, अपने अध्ययन के आधार पर पिकेटी का यह दृढ़ विश्वास है कि वे इन सबमें पूर्ण तबाही को अनिवार्य तौर पर नहीं देखते है। उनका मानना है कि समरसता की तरह ही विभाजन भी स्थायी नहीं है और संपत्ति के वितरण की संभावनाएं बेहद कम होने पर भी बनी रहती है। जाहिर है, इसमें राज्य की आर्थिक नीतियों, उसके रूझानों की भूमिका प्रमुख है। इसीलिये, सारी दुनिया में पिकेटी के अध्ययन और उनके निष्कर्षों के बारे में भारी आकर्षण है। वह किसी भी जन-कल्याणकारी राज्य की नीतियों के निर्धारण में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है और राज्य की अब तक की नीतियों में कमियों को उजागर भी करती है। उन्होंने पूंजी के मार्क्स के बताये गये अन्दुरूनी ढांचे को नये ऐतिहासिक संदर्भों में भी वैध मानते हुए भी गैर-क्रांतिकारी परिस्थितियों में अर्थनीतिक बदलावों के जरिये गैर-बराबरी पर अंकुश लगाने के उपायों की ओर संकेत किया है। यह गैर-क्रांतिकारी परिस्थितियों में वामपंथियों के राजनीतिक कार्यक्रमों के लिये एक बेहद उपयोगी अध्ययन साबित हो सकता है।